Saturday, March 26, 2011

बिखरा हुआ घरौंदा


बिखरा हुआ है जिंदगी का घरौंदा, आकर इसे संवार दो!
दिल की तनहाइयों की कसम, मुझे अब न इनकार दो!!
तुम छुपी हो घने बादलों में न जाने कहाँ!
आकर मेरे सपनो को इन्द्रधनुषी आकार दो!!
क्या पारिश्रमिक होगा तुझपर मर मिटने का!
नज़रों की हया, गाहे मुलाकात, जो चाहे पुरस्कार दो!!
बस बहुत हो चूका धुप-छाँव का ये खेल तुम्हारा!
इस दिल की तड़पती ज़मीं को, कुछ बूँदें उधार दो!!
नहीं कटता अब तनहा, जिंदगी का ये सफर!
हमसफ़र हमसे मिलकर, इक ज़रा प्यार दो!!

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