Wednesday, September 21, 2011

आप के आप होने में क्या बात है?


आप के आप होने में क्या बात है?
अगर आम नहीं हैं आप,
तो खास होने में क्या बात है?
आप के आप होने में क्या बात है?

कहते हैं जिगर में बड़ी आग है,
गर्म इतना की आपके सामने सब खाक हैं,
किसी के घर का दीया न जलाया, अंगीठी नहीं सुलगाई,
घरों को जलाती, रिश्तों को मिटाती, मशालें न बुझाई,
तो आपके आग के राख होने में क्या बात है?
आप के आप होने में क्या बात है?

कहते हैं शब्दों की समझ है, सुरों का ज्ञान है,
मुख से जो भी निकले आपके, नयी लय नया तान है,
मंचों पर झगड़ते, ये आप हैं, की आपका अभिमान है,
दिल से दिल को न मिलाया, दर्द-ऐ-दिल को शुकून न मिला,
तो कैसा ये आपका संगीत है, कैसी से सुरों की बारात है?
आप के आप होने में क्या बात है?

इतिहास हमारा “स्वर्णिम”, “अखंड” हमारा भूगोल,
फिर भी मस्तक अपना उठाने को रहा संसार टटोल,
धर्मों में बांटा, जातो में बांटा, सत्ता के लिए टुकडों में बांटा,
अतीत से डराया, वर्तमान को जलाया, भविष्य का क्या कहें?
राजनीति के फेर में रास्त्रनीति की बलि दे दी,
औरों के भण्डार भर कर घर को कंगाल किया,
तो ऐसे धर्मनिरपेक्ष जनतंत्र को सालों तक चलाने में क्या बात है?
आप के आप होने में क्या बात है?

आपके वादों पर हम मर मिटे, दिन गुजरे साल हुए,
गरीबी हटाओ, मंहगाई घटाओ, भाईचारा बढाओ,
साल दर साल चेहरे बदलते रहे, अंदाज भी बदला,
न बदले तो बस हालाते-ऐ-बेबसी हमारी,
“आम” आदमी से तो हम आदमी अच्छे थे,
‘कमबख्त’, आपके हुक्मरान होने भी क्या बात है?
आप के आप होने में क्या बात है?

आप के आप होने में क्या बात है?
अगर आम नहीं हैं आप,
तो खास होने में क्या बात है?
आप के आप होने में क्या बात है?

Saturday, March 26, 2011

वो मुस्कुराना तेरा!


आज भी याद आता है मुझे, इक हसीं चेहरा,
गली के मोड पर, अक्सर टकराती थी राहें,
नज़रें बचा कर वो देखना तेरा!

इधर-उधर ढूंढकर, मिलती थी जब मेरी नज़र,
दो निगाहों की गुफ्तगू और इनका मिलन,
वो निगाहें मिलते ही,
नज़रे झुकाकर मुस्कुराना तेरा!
बहुत याद आती हैं, वो मुस्कुराना तेरा!

हम तो समझे थे वो प्यार था तेरा,
उफ़! ये हया थी, के अंदाज कातिलाना तेरा!

तुम दिखी उस दिन,
बाजार में अपने अब्बा के साथ,
सर उठाया तक नहीं,
न नजरें ही मिली,
दिल की बात दिल में ही तड़प कर रह गयी,
क्या खबर थी की,
है आखिरी मुलाक़ात ये,
हाय! उसके बाद न मिली तुम,
वो मिला आखिरी नजराना तेरा!

फिर सुना इक दिन,
किसी की दुल्हन बनकर,
अजनबी सी चल गयी,
मैं न था, रो पड़े थे राह के पत्थर सभी,
ये असर कर गयी दिलों पे,
उस गली से जाना तेरा!

कमबख्त! आज भी याद आता है,
नज़रे झुका कर वो मुस्कुराना तेरा!!

हम हिंद के लोग भी अजीब होते हैं!


हम हिंद के लोग भी अजीब होते हैं!
दूरियां हमें बाँटती नहीं, दूरियों से हम और करीब होते हैं!!
तमाम मुश्किलों के बाद भी हम निरंतर बढ़ रहे हैं, ये क्या कम है!
नेताओं और बाबुओं में भी, कुछ लोग काम के मुरीद होते हैं!!
जय विज्ञान के देश में, चाँद पर पहुँच कर भी लोग नहीं बदले यहाँ!
मांगों में सिन्दूर हैं आज भी, पूजने से पत्थर भी सजीव होते हैं!!
अरे अक्ल के अंधे हुक्मरानों, अनेक गोधरा और गुजरात के वावजूद भी यहाँ!
चाय की चुस्कियों पर रोज सुबह, नुक्कड़ पे रघु, फ्रांसिस, सतनाम और फरीद होते हैं!!
हम हिंद के लोग भी अजीब होते हैं... हम हिंद के लोग भी अजीब होते हैं...

वो तेरा-मेरा प्यार


वो तेरा-मेरा प्यार, सच था या के कोई अफसाना !
मिला तू, फिर न मिला कोई दोस्त-यार न अनजाना !!
तेरा आना बहार था, न हो तुम, सब कुछ है विराना !
वो तेरे प्यार की कसीस थी, की मेरा मिज़ाज-ऐ-आशिकाना !!
तुम मिली तो पराये भी अपने थे, न हो तुम सारा जहां है बेगाना !
कहने को सब बदल गए, कमबख्त! न बदला तू न ये ज़माना !!

बिखरा हुआ घरौंदा


बिखरा हुआ है जिंदगी का घरौंदा, आकर इसे संवार दो!
दिल की तनहाइयों की कसम, मुझे अब न इनकार दो!!
तुम छुपी हो घने बादलों में न जाने कहाँ!
आकर मेरे सपनो को इन्द्रधनुषी आकार दो!!
क्या पारिश्रमिक होगा तुझपर मर मिटने का!
नज़रों की हया, गाहे मुलाकात, जो चाहे पुरस्कार दो!!
बस बहुत हो चूका धुप-छाँव का ये खेल तुम्हारा!
इस दिल की तड़पती ज़मीं को, कुछ बूँदें उधार दो!!
नहीं कटता अब तनहा, जिंदगी का ये सफर!
हमसफ़र हमसे मिलकर, इक ज़रा प्यार दो!!