Thursday, May 27, 2010

मैं ऐसा क्यों हूँ!!!

लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं कि "मैं ऐसा क्यूं हूँ?",
दुःख, आँसू, तड़प और यादों पर ही लिखता क्यों हूँ?
मैं कहता हूँ, जो देखता हूँ, जो मिलता है, वो लिखता हूँ||
मैं कवि हूँ, वियोगी हूँ, मुझको दुःख कटोचता है, झकझोड़ता है, खींचता है,
आज के समय में तो दुःख बिकता हैं, मैं तो सिर्फ लिखता हूँ||

क्या तुझे प्रकाश नहीं दिखता, खुशी नहीं भाती,
उमंग व उत्साह नहीं दिखता, हँसी नहीं भाती,
मुझे सब दिखता हैं, सब भाता हैं, दुनिया एक दिलासा है,
मुझे महँगाई, और मुद्रास्फीति बढ़ता दीखता है,
मुझे विश्वपटल पर उभरता व्यापक होता भारत दिखता है,
पर, मुझे कश्मीर से कन्याकुमारी तक शहीद जवानों के बढते आकडे भी दीखते हैं,
राजनितिक दलों कि देश को तोड़ने कि नित नयी साजिशें भी दिखती हैं,
नेताओं कि जेब भरनें कि तरकीबें और उनके गुर्गों कि नौटंकी दिखती है,
इन पर तो सब लिखते हैं आज कल, व्यक्तिगत रायों कि भरमार है, 
विश्व बैंक के अनेक प्रयासो के बाद भी, भारत पिछड़ेपन का शिकार है,
अरे, इतने बुद्धिजिवियोंं के बावजूद, लगता है हमारा देश बीमार है||

तो क्या प्रेम मृत है, प्रायः है।
संवेदना मृत है, प्रायः है।
इनके आंकड़े नहीं मिलते, सिर्फ अनुभूति होती है||
मन कि पीड़ा, दुःख के क्षण ,कैसा अनुभव, कैसी उलझन,
तुम क्या जानो, एक माँ ही जाने, क्या चीज प्रसूति होती है||

तूमको छू कर जो भी गुजरे, तुम उसपर कुछ छंद लिखो,
मैं तो अपने अनुभव, मन कि बातो, पर ही तुकबंद लिखूूँँ,


फिर न कहना लोगों मुझसे कि "मैं ऐसा क्यूं हूँ?",
गम, आँसू, तड़प और यादों पर ही लिखता क्यों हूँ?

~ आनंद

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