Thursday, August 19, 2010

मेरी एक पसंदीदा गज़ल - मैं सोचता हूँ

मैं सोचता हूँ कि इतनी बड़ी है ये दुनिया,
कोई तो ऐसा भी होगा, जो मुझको चाहेगा||

न जाने कौन है वो, जिससे प्यार है मुझको,
बहुत दिनों से बड़ा, इंतज़ार है मुझको,
मैं लिख रहा हूँ रिशालों में गीत अरसो से,
लिखीं है जो किसी, गुमनाम महज़बीं के नाम,
किसी कि शर्म् गी, आँखों में रंग भर देंगी,
दबी जबानों से इज़हार ऐ इस्क कर देंगे|

हर एक शहर में जा के सवाल करता हूँ,
हरेक मोड से इस, सोच में गुजरता हूँ,
कोई कलम को मेरे प्यार कि अदा देदे,
ये मेरी सोहरतें ले के, मुझे वफ़ा देदे,
मेरी कहानी का उन्बान बनके आये कोई,
कभी तो रूह का सामान बनके आये कोई|

मैं सोचता हूँ कि इतनी बड़ी है ये दुनिया,
कोई तो ऐसा भी होगा, जो मुझको चाहेगा||

Thursday, May 27, 2010

मैं ऐसा क्यों हूँ!!!

लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं कि "मैं ऐसा क्यूं हूँ?",
दुःख, आँसू, तड़प और यादों पर ही लिखता क्यों हूँ?
मैं कहता हूँ, जो देखता हूँ, जो मिलता है, वो लिखता हूँ||
मैं कवि हूँ, वियोगी हूँ, मुझको दुःख कटोचता है, झकझोड़ता है, खींचता है,
आज के समय में तो दुःख बिकता हैं, मैं तो सिर्फ लिखता हूँ||

क्या तुझे प्रकाश नहीं दिखता, खुशी नहीं भाती,
उमंग व उत्साह नहीं दिखता, हँसी नहीं भाती,
मुझे सब दिखता हैं, सब भाता हैं, दुनिया एक दिलासा है,
मुझे महँगाई, और मुद्रास्फीति बढ़ता दीखता है,
मुझे विश्वपटल पर उभरता व्यापक होता भारत दिखता है,
पर, मुझे कश्मीर से कन्याकुमारी तक शहीद जवानों के बढते आकडे भी दीखते हैं,
राजनितिक दलों कि देश को तोड़ने कि नित नयी साजिशें भी दिखती हैं,
नेताओं कि जेब भरनें कि तरकीबें और उनके गुर्गों कि नौटंकी दिखती है,
इन पर तो सब लिखते हैं आज कल, व्यक्तिगत रायों कि भरमार है, 
विश्व बैंक के अनेक प्रयासो के बाद भी, भारत पिछड़ेपन का शिकार है,
अरे, इतने बुद्धिजिवियोंं के बावजूद, लगता है हमारा देश बीमार है||

तो क्या प्रेम मृत है, प्रायः है।
संवेदना मृत है, प्रायः है।
इनके आंकड़े नहीं मिलते, सिर्फ अनुभूति होती है||
मन कि पीड़ा, दुःख के क्षण ,कैसा अनुभव, कैसी उलझन,
तुम क्या जानो, एक माँ ही जाने, क्या चीज प्रसूति होती है||

तूमको छू कर जो भी गुजरे, तुम उसपर कुछ छंद लिखो,
मैं तो अपने अनुभव, मन कि बातो, पर ही तुकबंद लिखूूँँ,


फिर न कहना लोगों मुझसे कि "मैं ऐसा क्यूं हूँ?",
गम, आँसू, तड़प और यादों पर ही लिखता क्यों हूँ?

~ आनंद

Wednesday, May 26, 2010

आशिक - An extempore on tissue paper

जिन्हें देख कर खुश हुआ करते थे,

हमें आज वो गमज़दा कर गए||

दो प्यार भरे बोल के बदले,

मेरे दामन को काँटों से भर गए||

हम सोचते थे जिन्हें कि वो मेरे हैं,

भरी महफ़िल में हमें वो तनहा कर गए||

तनहाइयों में हमसफ़र हुआ करते थे,

मजलिसे यार में अकेला कर गए||

साकी क्या तेरा शुक्रिया अदा करूँ,

गम के साथ, जामे मीना भी पिला गए||

अब क्या उनका गम करूँ मैं आशिक,

जाते-जाते आशिकी का नया अंदाज़ सिखा गए||

मानव संशाधन के मंत्री आये

मानव संशाधन के मंत्री आये,
सभी तथाकथित संत्री घबराए|
आकाश में काले बादल छाये,
कहीं, शरद ऋतू में वर्षा न आये||

अनेक शंकायें, कुछ समाधान, कुछ में अभी भी व्यवधान|
भविष्य की योजनायों के जल-मीन का कैसे हो नेत्र संधान?
आपने किया हमारा इस हेतु सामूहिक सार्वजनिक आह्वान|
हम साथ-साथ हैं, मिल के होगा नेत्र संधान,
ये भरोसा है हमारा, नहीं आश्वासन, नहीं ज्ञान||

Thursday, May 20, 2010

क्यों आये याद तुम

आज फिर कर गए, मुझे कुछ नाराज़ तुम,
इतने दिनों बाद मुझको, क्यों आये याद तुम||
दिन बहुत बीत गए, न दुआ न सलाम,
क्या हुआ जो सुन गए, मेरी फ़रियाद तुम||
एहसान कहूँ तुम्हारा, या कहूँ ज़र्रानवाजी,
मेरे ख्यालो की वादी को, कर गए आबाद तुम||
तुम तो ऐसे नहीं थे, बदले क्यों तुमने तेवर,
दिल की आवाज़ सुनते थे, अब समझते नहीं अल्फाज़ तुम||

Tuesday, May 18, 2010

यादें - जज्बातों के झंझावात

उनकी याद
आज सब मशगुल हैं, मसरूफ हैं,
वक़्त कहाँ है, जो कोई करे मुझ नाचीज पर बर्बाद,
ऐसे में यूं ही अचानक, आज हमने कर लिया जो उनको याद,
उफ़, उस ज़ालिम से ना समझी गयी दिल की बात,
समझ बैठे वो की कोई मतलब हमारा है, जो कर रहें फ़रियाद,
क्या कोई यूँ ही पूछता है, आजकल किसी का हाल,
कमबख्त कहाँ से आ गया ये जल्लाद,
अरे ज़नाब हम कहाँ इस काबिल थे, की कोई कर लेता हमें भी याद,
ये दिल भूलता नहीं बीते दिन, अच्छे लोग और उनका साथ,
यूँ ही तनहाइयों में जब नहीं कुछ सूझता,
लोग जो दिल के करीब हैं, कर लेता हूँ उनको याद|
हाय उनकी याद....