Collection of my thoughts... weird, most of the time... different aspects of life... on different subject, which interests me... weird, once again... :)
Thursday, August 19, 2010
मेरी एक पसंदीदा गज़ल - मैं सोचता हूँ
Thursday, May 27, 2010
मैं ऐसा क्यों हूँ!!!
दुःख, आँसू, तड़प और यादों पर ही लिखता क्यों हूँ?
मैं कहता हूँ, जो देखता हूँ, जो मिलता है, वो लिखता हूँ||
मैं कवि हूँ, वियोगी हूँ, मुझको दुःख कटोचता है, झकझोड़ता है, खींचता है,
आज के समय में तो दुःख बिकता हैं, मैं तो सिर्फ लिखता हूँ||
क्या तुझे प्रकाश नहीं दिखता, खुशी नहीं भाती,
उमंग व उत्साह नहीं दिखता, हँसी नहीं भाती,
मुझे सब दिखता हैं, सब भाता हैं, दुनिया एक दिलासा है,
मुझे महँगाई, और मुद्रास्फीति बढ़ता दीखता है,
मुझे विश्वपटल पर उभरता व्यापक होता भारत दिखता है,
पर, मुझे कश्मीर से कन्याकुमारी तक शहीद जवानों के बढते आकडे भी दीखते हैं,
राजनितिक दलों कि देश को तोड़ने कि नित नयी साजिशें भी दिखती हैं,
नेताओं कि जेब भरनें कि तरकीबें और उनके गुर्गों कि नौटंकी दिखती है,
इन पर तो सब लिखते हैं आज कल, व्यक्तिगत रायों कि भरमार है,
विश्व बैंक के अनेक प्रयासो के बाद भी, भारत पिछड़ेपन का शिकार है,
अरे, इतने बुद्धिजिवियोंं के बावजूद, लगता है हमारा देश बीमार है||
तो क्या प्रेम मृत है, प्रायः है।
इनके आंकड़े नहीं मिलते, सिर्फ अनुभूति होती है||
मन कि पीड़ा, दुःख के क्षण ,कैसा अनुभव, कैसी उलझन,
तूमको छू कर जो भी गुजरे, तुम उसपर कुछ छंद लिखो,
मैं तो अपने अनुभव, मन कि बातो, पर ही तुकबंद लिखूूँँ,
Wednesday, May 26, 2010
आशिक - An extempore on tissue paper
जिन्हें देख कर खुश हुआ करते थे,
हमें आज वो गमज़दा कर गए||
दो प्यार भरे बोल के बदले,
मेरे दामन को काँटों से भर गए||
हम सोचते थे जिन्हें कि वो मेरे हैं,
भरी महफ़िल में हमें वो तनहा कर गए||
तनहाइयों में हमसफ़र हुआ करते थे,
मजलिसे यार में अकेला कर गए||
साकी क्या तेरा शुक्रिया अदा करूँ,
गम के साथ, जामे मीना भी पिला गए||
अब क्या उनका गम करूँ मैं “आशिक”,
जाते-जाते आशिकी का नया अंदाज़ सिखा गए||
मानव संशाधन के मंत्री आये
मानव संशाधन के मंत्री आये,
सभी तथाकथित संत्री घबराए|
आकाश में काले बादल छाये,
कहीं, शरद ऋतू में वर्षा न आये||
अनेक शंकायें, कुछ समाधान, कुछ में अभी भी व्यवधान|
भविष्य की योजनायों के जल-मीन का कैसे हो नेत्र संधान?
आपने किया हमारा इस हेतु सामूहिक सार्वजनिक आह्वान|
हम साथ-साथ हैं, मिल के होगा नेत्र संधान,
ये भरोसा है हमारा, नहीं आश्वासन, नहीं ज्ञान||