Friday, November 12, 2021

कब होती है कविता

कब होती है कविता

पूछते हैं कई लोग मुझसे
कब होती है कविता।

खुश हों तब आपके मनोभाव
या दुःखी हो मन देख किसी के घाव।
खुद के अंदर की बातें
पारिस्थितिक विवशतायें
जीवन की आपाधापी, झंझावातें
या विश्व की समस्याओं में जागती रातें।
पेट की जब बुझी हो आग
या भूख जगाती कोई राग।
आखिर कब होती है कविता?

कवि मन हो जब उद्वेलित 
भाव जब स्वतः गढ़ ले शब्दों का रूप
दुःख विदित हो किसी का
या निहित स्वार्थ स्व-सिद्धि का
किसी का रूप जब मोह ले मन
या ईश्वरीय सौंदर्य भुला दे तन
हाँ, हाँ, इन सब के होने पर
और इनके परे भी कुछ होने पर
तब, उसी क्षण होती है कविता

जो गढ़ता है वो भोगता है
जो पढ़ता है वो जीता है
जो सुनता है वो भींगता है
आदिकवि हों या कोई और
दुःख, कष्ट, दारिद्रय, व आह
सुंदरता देख स्वतः जब निकले वाह
कवि हो विवश, क्या करे प्रयास
पत्र पर शब्द ब्रह्म हों अंकित अनायास
हाँ, हाँ, इन सब के होने पर
और इनके परे भी कुछ होने पर
तब, उसी क्षण होती है कविता। - आनंद कुमार झा १२/११/२०२१

Saturday, February 6, 2021

मैं बुद्धिजीवी हूँ

मैं बुद्धिजीवी हूँ
हथेली पे सरसों उगा रहा हूँ
लोग कुछ भी कहें
मैं पगला, अव्यवहारिकता के फूल उगा कर के ही मानूँगा
अव्यवथा की आग भले ही गरीबों की रोटी ना सेक सके
उनके आर्थिक व मानसिक कमियों की आग में 
अपनी रोटी क्या नान भी बनेगी
सामंजस्य, सहअस्तित्व, सामाजिक सरोकार की बातें
मेरा मुखोटा हैं, व्यवहार सर्वथा विपरीत
भूत व वर्तमान हैं प्रमाण, गाते मेरे रक्तिम गीत
किसी समस्या का कोई समाधान देने की क्षमता नहीं मुझमें
परन्तु हर समस्या के जड़ में मैं हूँ

मेरी दार्शनिक दृष्टि एक छलावा है
मेरा कोई वाद नहीं है
मैं सभी वादों में होता हूँ
और उन सभी वादों से परे हूँ
मेरे विरोधी कहते है!
वे क्या ख़ाक कहेंगे?
उन्हें मैंने इतने टुकड़ों में बाँट रखा है
उनके तथ्य भी असत्य
मेरी मिथ्या भी सर्वमान्य
मेरी व्यूहरचना (पीयर ग्रुप) सर्वव्याप्य
उनकी टुकड़ी बिखड़ी इधर-उधर
मैं समझाता, सुन पगले! 
मेरे सभी वैचारिक वाद विफल
पर क्या हमारे प्रभाव को छू सकी
तू क्या मुझे झूठलायेगा
तेरी आने वाली पीढ़ियों के शिक्षा-बीज में मेरा विष है
वो मेरे विष का पान कर
मेरा ही वंदन करेंगे
मैं बुद्धिजीवी, हर हथेली पे सरसों का स्वप्न उगा के ही मानूँगा
और तब भी न थमूँगा
क्योंकि, मूर्ख भेड़ हमेशा हम रंगे सियारो का शिकार बनेंगे।।
~ आनंद ०७-०२-२१

Friday, February 5, 2021

चलो आज बसंत की बात करते हैं

चलो आज बसंत की बात करते हैं,
तुम्हारे पसंद की बात करते हैं।

नव वर्ष, नूतन हर्ष, नया सब कलेवर है,
नई धरा, आकाश नया, नित नव अवसर है,
पीली सरसों है सब ओर,
नव किरणों से सराबोर,
पंछी चहके गाते गीत,
प्रेमी ढूंढें बिछड़े मीत,
कितनी अच्छी हैं ये बातें,
सोचो, बिन बसंत हम कर पाते?

प्रकृति-चक्र के साथ करते हैं,
चलो, फिर आज बसंत की बात करते हैं,
तुम्हारे पसंद की बात करते हैं।

मुझ में आ के मिल जाती है,
गुड़ सी मीठी घुल जाती है,
कल-कल नदिया बहती जाती,
कली-कली फूलों पे मंडराती,
जीवन भ्रमर फिर इठलाती है,
इसके बिन क्या हम मनुष्य रह पाते?

नव स्फूर्ति नव 'आनंद' की बात करते हैं,
चलो, फिर आज बसंत की बात करते हैं,
तुम्हारे पसंद की बात करते हैं।

~ आनंद ०५/०२/२०२१

Wednesday, November 20, 2019

पिसता है आदमी

ये क्या है कि न जाने कौन सी चक्की में पिसता है आदमी,
दो वक्त की रोटी के लिए कौड़ियों के भाव बिकता है आदमी।

क्या है उसका गर नहीं कुछ बचा स्वाभिमान भी पास उसके,
कौन है जो रोज तौलता और फिर अपने पैरों से रौंदता है आदमी।

उससे पूछो जाके कोई, किस बात का तुम चाहते ये मूल्य अमूल्य,
अपने बच्चों की खातिर, किस कदर अब और तड़पेगा ये आदमी।

जब मिला, कुछ कर गिला, और कुछ नए-पुराने अरमानों को जला,
हर गए दिन के साथ, कुछ कम आदमी होता सा ये आदमी।

बेपरवाह

जिंदगी कुछ इस तरह गुजारी हमने बेपरवाह,
मौत से भी कर ली यारी हो हमने बेपरवाह।

चंद सिक्कों के लिये बिकते लोग, हैं कितने बेपरवाह,
जीवनभर की पूंजी यूँ ही लूटा दी हमने बेपरवाह।

आदमी पर पैर रख ऊँचा होता आदमी, है कितना बेपरवाह,
दुश्मनों के वास्ते भी दोस्ती ठुकरा दी हमने बेपरवाह।

क्या भला है, बुरा है क्या, आदमी क्यों आज है इतना बेपरवाह,
हर भले-बुरे से परे, ज़िंदगी हमनें गुजारी हो करके बेपरवाह।।

Saturday, October 19, 2019

कह दो जमाने से

कोई हाल न पूछे मेरा, कह दो जमाने से,
हस्ती ही जब मिट गई, मिटा दो नाम भी फसाने से।

ज़िन्दगी क्या है, जब छूट गया घर-परिवार,
क्या मिला मुझको शहर जा चंद सिक्के कमाने से।

जिसे तुम प्यार करते हो, उसे प्यार नहीं करते,
मोह्हबत है ये या कोई दिल्लगी, कोई पूछे ज़रा दीवाने से।

रोज़ दौड़ता- भागता, ज़िन्दगी का बोझ लिये,
ज़िंदा लाश है, मरा नहीं अभी, क्या फायदा इसे दफनाने से।

दोस्तों की कमी नहीं, बस उनका ही सहारा है,
कुछ मैं तकल्लुफ़ पसंद, कुछ मसगूल-ओ-मगरूर आजमाने से।

- आनंद (२०/१०/२०१९)

Monday, October 7, 2019

मैं जीवनवादी हूँ।

लोग कहते हैं, तुम निराशावादी हो,
मैं कहता हूँ, जी नहीं, जिंदगी का आदी हूँ,
अपनी तमाम कमियों के बावजूद,
मौत का प्रतिवादी हूँ,
जी हाँ, है जिंदगी रहस्य,
तो मैं रहस्यवादी हूँ।

तो क्या तुम आशावादी हो,
अरे कहाँ, कैसे और कब,
साबित कैसे हो,
सबकी अपनी-अपनी आशा,
और आशावाद की परिभाषा,
पल का पता नहीं, कल का क्या कहें,
भविष्य के गर्भ का क्या कहें,

अच्छा भी सोचो कभी!
सही है, पर अच्छा क्या है?
जो हो चुका क्या फर्क,
जो हो रहा, क्यों तर्क,
जो होगा, क्या पता, फिर कैसे अच्छा?

कल, आज और कल में
ज़िन्दगी के दिन गुज़ारता है आदमी,
या ज़िन्दगी आदमी को खरचती है,
घंटा, मिनट व सेकंड की पूंजी लूट रही है,
और गर वो अपने सच में जिये जाए,
कह दे कि आज पे कल की क्या खबर,तौबा!
जी क्या कहूँ मैं किस-वादी हूँ,
मैं सिर्फ जीवनवादी हूँ।

- आनंद ०७/१०/१९