मैं बुद्धिजीवी हूँ
हथेली पे सरसों उगा रहा हूँ
लोग कुछ भी कहें
मैं पगला, अव्यवहारिकता के फूल उगा कर के ही मानूँगा
अव्यवथा की आग भले ही गरीबों की रोटी ना सेक सके
उनके आर्थिक व मानसिक कमियों की आग में
अपनी रोटी क्या नान भी बनेगी
सामंजस्य, सहअस्तित्व, सामाजिक सरोकार की बातें
मेरा मुखोटा हैं, व्यवहार सर्वथा विपरीत
भूत व वर्तमान हैं प्रमाण, गाते मेरे रक्तिम गीत
किसी समस्या का कोई समाधान देने की क्षमता नहीं मुझमें
परन्तु हर समस्या के जड़ में मैं हूँ
मेरी दार्शनिक दृष्टि एक छलावा है
मेरा कोई वाद नहीं है
मैं सभी वादों में होता हूँ
और उन सभी वादों से परे हूँ
मेरे विरोधी कहते है!
वे क्या ख़ाक कहेंगे?
उन्हें मैंने इतने टुकड़ों में बाँट रखा है
उनके तथ्य भी असत्य
मेरी मिथ्या भी सर्वमान्य
मेरी व्यूहरचना (पीयर ग्रुप) सर्वव्याप्य
उनकी टुकड़ी बिखड़ी इधर-उधर
मैं समझाता, सुन पगले!
मेरे सभी वैचारिक वाद विफल
पर क्या हमारे प्रभाव को छू सकी
तू क्या मुझे झूठलायेगा
तेरी आने वाली पीढ़ियों के शिक्षा-बीज में मेरा विष है
वो मेरे विष का पान कर
मेरा ही वंदन करेंगे
मैं बुद्धिजीवी, हर हथेली पे सरसों का स्वप्न उगा के ही मानूँगा
और तब भी न थमूँगा
क्योंकि, मूर्ख भेड़ हमेशा हम रंगे सियारो का शिकार बनेंगे।।
~ आनंद ०७-०२-२१
No comments:
Post a Comment