मौत से भी कर ली यारी हो हमने बेपरवाह।
चंद सिक्कों के लिये बिकते लोग, हैं कितने बेपरवाह,
जीवनभर की पूंजी यूँ ही लूटा दी हमने बेपरवाह।
आदमी पर पैर रख ऊँचा होता आदमी, है कितना बेपरवाह,
दुश्मनों के वास्ते भी दोस्ती ठुकरा दी हमने बेपरवाह।
क्या भला है, बुरा है क्या, आदमी क्यों आज है इतना बेपरवाह,
हर भले-बुरे से परे, ज़िंदगी हमनें गुजारी हो करके बेपरवाह।।
No comments:
Post a Comment