Collection of my thoughts... weird, most of the time... different aspects of life... on different subject, which interests me... weird, once again... :)
Wednesday, November 20, 2019
पिसता है आदमी
बेपरवाह
Saturday, October 19, 2019
कह दो जमाने से
Monday, October 7, 2019
मैं जीवनवादी हूँ।
लोग कहते हैं, तुम निराशावादी हो,
मैं कहता हूँ, जी नहीं, जिंदगी का आदी हूँ,
अपनी तमाम कमियों के बावजूद,
मौत का प्रतिवादी हूँ,
जी हाँ, है जिंदगी रहस्य,
तो मैं रहस्यवादी हूँ।
तो क्या तुम आशावादी हो,
अरे कहाँ, कैसे और कब,
साबित कैसे हो,
सबकी अपनी-अपनी आशा,
और आशावाद की परिभाषा,
पल का पता नहीं, कल का क्या कहें,
भविष्य के गर्भ का क्या कहें,
अच्छा भी सोचो कभी!
सही है, पर अच्छा क्या है?
जो हो चुका क्या फर्क,
जो हो रहा, क्यों तर्क,
जो होगा, क्या पता, फिर कैसे अच्छा?
कल, आज और कल में
ज़िन्दगी के दिन गुज़ारता है आदमी,
या ज़िन्दगी आदमी को खरचती है,
घंटा, मिनट व सेकंड की पूंजी लूट रही है,
और गर वो अपने सच में जिये जाए,
कह दे कि आज पे कल की क्या खबर,तौबा!
जी क्या कहूँ मैं किस-वादी हूँ,
मैं सिर्फ जीवनवादी हूँ।
- आनंद ०७/१०/१९
Saturday, August 17, 2019
पिता की स्मृति में...
क्या होता है पिता का गुजर जाना
आत्मबल का क्षराव
बाह्य संबल का अभाव
मानसिक अंग का विलगाव
या कोई छोटा सा घाव।
क्या होता है पिता का गुजर जाना।।
क्या होता है पिता का गुजर जाना
सिर्फ अपने के वियोग से विक्षोभ
या कुछ और आयु का भोग
किसी की कमी का मनोरोग
आत्मा का मुझमें आत्मयोग।
क्या होता है पिता का गुजर जाना।।
क्या होता है पिता का गुजर जाना
एक जिम्मेदारी का एहसास
अपनो से दूर, पर दिलों के पास
रिश्तों को एक नई आस
बीते दिनों की याद, दिल है उदास।
क्या होता है पिता का गुजर जाना।।
क्या होता है पिता का गुजर जाना
रोने को एक कंधे का न होना
मुश्किलों में ढाँढस का खो जाना
दुनिया से लड़ गुजरने की हिम्मत
पर हिम्मत का संयम में परिणत हो जाना
क्या होता है पिता का गुजर जाना।।
क्या होता है पिता का गुजर जाना
किसी अनजान की सशर्त संवेदना
या किसी अपने की ही हृदय वेदना
जिंदगी से लड़ाई, होना या खुद का ना होना
रिश्तों का ढाँढस, अपने साहस का आना
क्या होता है पिता का गुजर जाना।।
- आनंद (१०-०८-२०१९)
ज़िन्दगी से रिश्ता निभाता हूँ
तुमको जो मैं हमेशा हँसता-मुस्कुराता दिखता हूँ,
क्या खूब ये अपना ज़िन्दगी से रिश्ता निभाता हूँ।।
- आनंद (१५-०८-२०१९)
सितमगर का प्यार
तुम कितना ये ज़ुल्म करते
हम प्यार तुमसे क्या करते?
जब तुम मेरे बस में ही नहीं रहते।
ये जब कहते, मैं कहता तो क्या?
तुम्हे कोई प्यार नहीं?
अरे ये प्यार है कोई व्योपार नहीं।
पर तुम तो ठहरे व्योपारी,
आदमी, आदमी कहाँ? वो तो है तरकारी
अजी हाँ, एहि तो है फरमान सरकारी।
रोज़ रोज़ गर्दनों पे ये तुम्हारी छुरी
हम मुर्दा क्या बुरे, ये जीना है बुरी
तुम झटका ही करो, बक्शो मेरी ये हलाली।
हमारी कमज़ोरी, तुम्हारी बलजोरी,
पूरब पूरब ही रहे, तुम कहो पछवारी,
अपना कौन, बिछड़े सभी बारी-बारी।
- आनंद (०९-०८-२०१९)
Wednesday, June 19, 2019
कुछ कर गुजर गया होता तो अच्छा होता
मैं मर गया होता तो अच्छा होता,
हद से गुज़र गया होता तो अच्छा होता,
यूँ घुट-घुट के जीना भी क्या जीना है,
कुछ कर गुजर गया होता तो अच्छा होता।
उसका रोना भी क्या रोना था,
उसके होने में भी कोई होना था,
मोह्हबत का इज़हार भी कोई चुप्पी है,
आह भी भर गया होता तो अच्छा होता।
माना प्यार इश्क़ के मुआमले में कच्चा था,
उम्र से ही नहीं तबियत से भी बच्चा था,
गले मिलता था रकीबों से भी बड़े ख़ुलूस से,
ज़माने से दुश्मनी कर लेता तो अच्छा होता।
क्या बुरा था मेहबूब की गली से गुज़र जाना,
पुरानी यादों का फिर से ताज़ा हो जाना,
उसकी ज़िन्दादिली की मिसालें देते लोग,
जानते-बूझते धोखा खा लेता तो अच्छा होता।
क्यों मुझे फिर आज आवाज़ देते हो,
जो बुझ रही है उसे फिर आग देते हो,
ऐ ज़िन्दगी कब तक यूँ ही जलता-बुझता रहूँगा मैं,
कोई हवा का झोंका इस राख को बहा लेता तो अच्छा होता।।
- आनंद (२०/०६/१९)