कब होती है कविता
पूछते हैं कई लोग मुझसे
कब होती है कविता।
खुश हों तब आपके मनोभाव
या दुःखी हो मन देख किसी के घाव।
खुद के अंदर की बातें
पारिस्थितिक विवशतायें
जीवन की आपाधापी, झंझावातें
या विश्व की समस्याओं में जागती रातें।
पेट की जब बुझी हो आग
या भूख जगाती कोई राग।
आखिर कब होती है कविता?
कवि मन हो जब उद्वेलित
भाव जब स्वतः गढ़ ले शब्दों का रूप
दुःख विदित हो किसी का
या निहित स्वार्थ स्व-सिद्धि का
किसी का रूप जब मोह ले मन
या ईश्वरीय सौंदर्य भुला दे तन
हाँ, हाँ, इन सब के होने पर
और इनके परे भी कुछ होने पर
तब, उसी क्षण होती है कविता
जो गढ़ता है वो भोगता है
जो पढ़ता है वो जीता है
जो सुनता है वो भींगता है
आदिकवि हों या कोई और
दुःख, कष्ट, दारिद्रय, व आह
सुंदरता देख स्वतः जब निकले वाह
कवि हो विवश, क्या करे प्रयास
पत्र पर शब्द ब्रह्म हों अंकित अनायास
हाँ, हाँ, इन सब के होने पर
और इनके परे भी कुछ होने पर
तब, उसी क्षण होती है कविता। - आनंद कुमार झा १२/११/२०२१