Wednesday, November 20, 2019

पिसता है आदमी

ये क्या है कि न जाने कौन सी चक्की में पिसता है आदमी,
दो वक्त की रोटी के लिए कौड़ियों के भाव बिकता है आदमी।

क्या है उसका गर नहीं कुछ बचा स्वाभिमान भी पास उसके,
कौन है जो रोज तौलता और फिर अपने पैरों से रौंदता है आदमी।

उससे पूछो जाके कोई, किस बात का तुम चाहते ये मूल्य अमूल्य,
अपने बच्चों की खातिर, किस कदर अब और तड़पेगा ये आदमी।

जब मिला, कुछ कर गिला, और कुछ नए-पुराने अरमानों को जला,
हर गए दिन के साथ, कुछ कम आदमी होता सा ये आदमी।

बेपरवाह

जिंदगी कुछ इस तरह गुजारी हमने बेपरवाह,
मौत से भी कर ली यारी हो हमने बेपरवाह।

चंद सिक्कों के लिये बिकते लोग, हैं कितने बेपरवाह,
जीवनभर की पूंजी यूँ ही लूटा दी हमने बेपरवाह।

आदमी पर पैर रख ऊँचा होता आदमी, है कितना बेपरवाह,
दुश्मनों के वास्ते भी दोस्ती ठुकरा दी हमने बेपरवाह।

क्या भला है, बुरा है क्या, आदमी क्यों आज है इतना बेपरवाह,
हर भले-बुरे से परे, ज़िंदगी हमनें गुजारी हो करके बेपरवाह।।