दो वक्त की रोटी के लिए कौड़ियों के भाव बिकता है आदमी।
क्या है उसका गर नहीं कुछ बचा स्वाभिमान भी पास उसके,
कौन है जो रोज तौलता और फिर अपने पैरों से रौंदता है आदमी।
उससे पूछो जाके कोई, किस बात का तुम चाहते ये मूल्य अमूल्य,
अपने बच्चों की खातिर, किस कदर अब और तड़पेगा ये आदमी।
जब मिला, कुछ कर गिला, और कुछ नए-पुराने अरमानों को जला,
हर गए दिन के साथ, कुछ कम आदमी होता सा ये आदमी।