Saturday, October 19, 2019

कह दो जमाने से

कोई हाल न पूछे मेरा, कह दो जमाने से,
हस्ती ही जब मिट गई, मिटा दो नाम भी फसाने से।

ज़िन्दगी क्या है, जब छूट गया घर-परिवार,
क्या मिला मुझको शहर जा चंद सिक्के कमाने से।

जिसे तुम प्यार करते हो, उसे प्यार नहीं करते,
मोह्हबत है ये या कोई दिल्लगी, कोई पूछे ज़रा दीवाने से।

रोज़ दौड़ता- भागता, ज़िन्दगी का बोझ लिये,
ज़िंदा लाश है, मरा नहीं अभी, क्या फायदा इसे दफनाने से।

दोस्तों की कमी नहीं, बस उनका ही सहारा है,
कुछ मैं तकल्लुफ़ पसंद, कुछ मसगूल-ओ-मगरूर आजमाने से।

- आनंद (२०/१०/२०१९)

Monday, October 7, 2019

मैं जीवनवादी हूँ।

लोग कहते हैं, तुम निराशावादी हो,
मैं कहता हूँ, जी नहीं, जिंदगी का आदी हूँ,
अपनी तमाम कमियों के बावजूद,
मौत का प्रतिवादी हूँ,
जी हाँ, है जिंदगी रहस्य,
तो मैं रहस्यवादी हूँ।

तो क्या तुम आशावादी हो,
अरे कहाँ, कैसे और कब,
साबित कैसे हो,
सबकी अपनी-अपनी आशा,
और आशावाद की परिभाषा,
पल का पता नहीं, कल का क्या कहें,
भविष्य के गर्भ का क्या कहें,

अच्छा भी सोचो कभी!
सही है, पर अच्छा क्या है?
जो हो चुका क्या फर्क,
जो हो रहा, क्यों तर्क,
जो होगा, क्या पता, फिर कैसे अच्छा?

कल, आज और कल में
ज़िन्दगी के दिन गुज़ारता है आदमी,
या ज़िन्दगी आदमी को खरचती है,
घंटा, मिनट व सेकंड की पूंजी लूट रही है,
और गर वो अपने सच में जिये जाए,
कह दे कि आज पे कल की क्या खबर,तौबा!
जी क्या कहूँ मैं किस-वादी हूँ,
मैं सिर्फ जीवनवादी हूँ।

- आनंद ०७/१०/१९