Monday, June 11, 2012

जिस-जिस में हो दम सामने आये

क़त्ल करने को घर से निकला हूँ,
जिस-जिस में हो दम सामने आये,
सारी बस्ती जलाने घर से निकला हूँ,
जिस-जिस में हो दम सामने आये||

क्यों बात सीधी मूंह कोई करता नहीं,
राह सीधी कोई क्योंकर चलता नहीं,
प्यार की बात कमबख्त समझता नहीं,
चुन-चुन के सबसे बदला है लेना मुझको,
दर से निकला हूँ ढूँढने आदम तुझको,
जिस-जिस में हो दम सामने आये||

जिन्दा लोग हैं की मुर्दा-ऐ-श्मसान कोई,
हँस के बोलें तो करते हैं एहसान कोई,
क्या मोहब्बत का है ये अंजाम कोई,
तुम इंसान हो, की हम नहीं इंसान कोई,
आज ये फैसला होगा, नहीं मजाक कोई,
जिस-जिस में हो दम सामने आये||

फिर ये सोचा मैंने, 
क्या हुआ जो कुछ बदला है मेरे आगे,
ये अच्छा है बुरा है, जो है मेरे आगे,
कह दो न आये वो ज़ालिम मेरे आगे,
फलक का चाँद मैं, ज़र्रा वो मेरे आगे,
बदलता नहीं मैं, कोई भी आये मेरे आगे,
जिस-जिस में हो दम सामने आये||

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