मैं मर गया होता तो अच्छा होता,
हद से गुज़र गया होता तो अच्छा होता,
यूँ घुट-घुट के जीना भी क्या जीना है,
कुछ कर गुजर गया होता तो अच्छा होता।
उसका रोना भी क्या रोना था,
उसके होने में भी कोई होना था,
मोह्हबत का इज़हार भी कोई चुप्पी है,
आह भी भर गया होता तो अच्छा होता।
माना प्यार इश्क़ के मुआमले में कच्चा था,
उम्र से ही नहीं तबियत से भी बच्चा था,
गले मिलता था रकीबों से भी बड़े ख़ुलूस से,
ज़माने से दुश्मनी कर लेता तो अच्छा होता।
क्या बुरा था मेहबूब की गली से गुज़र जाना,
पुरानी यादों का फिर से ताज़ा हो जाना,
उसकी ज़िन्दादिली की मिसालें देते लोग,
जानते-बूझते धोखा खा लेता तो अच्छा होता।
क्यों मुझे फिर आज आवाज़ देते हो,
जो बुझ रही है उसे फिर आग देते हो,
ऐ ज़िन्दगी कब तक यूँ ही जलता-बुझता रहूँगा मैं,
कोई हवा का झोंका इस राख को बहा लेता तो अच्छा होता।।
- आनंद (२०/०६/१९)